Thursday, January 17, 2008
Tuesday, January 15, 2008
सेमल से पुनः
तुम पर फूल अभी तक नहीं आये
सेमल
और मैं तुमसे बिछुड़ रहा हूँ
सेमल
अभी तुम्हारी शाखें हैं सूनी
छायी नहीं है बहार अब तक तुम पर
उम्मीद करता हूँ जल्द ही लाल
फूलों से लद जाओगे तुम
और मैं तब तुमसे मिलने एक बार आऊँगा ज़रूर
हॉं एक बार ।
कविः-
विप्लव
सेमल
और मैं तुमसे बिछुड़ रहा हूँ
सेमल
अभी तुम्हारी शाखें हैं सूनी
छायी नहीं है बहार अब तक तुम पर
उम्मीद करता हूँ जल्द ही लाल
फूलों से लद जाओगे तुम
और मैं तब तुमसे मिलने एक बार आऊँगा ज़रूर
हॉं एक बार ।
कविः-
विप्लव
ऊब है मुझे
मुझे ऊब है
अपने इन जगवालों से
मुझे ऊब है
यहॉं के भोज निरालों से
मुझे ऊब है
स्वर्ग सी अप्सराओं से
औ इनके मयखानों
के प्यालों से
मुझे ऊब है
गृहस्थ लोगों
के विचारों से
मुझे ऊब है
व्यर्थ के खेल
विकारों से
मुझे ऊब है
घर की चारदिवारी से
हॉं पर ऊबता नहीं मैं
पुस्तकों, पेडों-फ़ूलों, औ
जन्तु-जीवों प्यारों से !
कविः
विप्लव
अपने इन जगवालों से
मुझे ऊब है
यहॉं के भोज निरालों से
मुझे ऊब है
स्वर्ग सी अप्सराओं से
औ इनके मयखानों
के प्यालों से
मुझे ऊब है
गृहस्थ लोगों
के विचारों से
मुझे ऊब है
व्यर्थ के खेल
विकारों से
मुझे ऊब है
घर की चारदिवारी से
हॉं पर ऊबता नहीं मैं
पुस्तकों, पेडों-फ़ूलों, औ
जन्तु-जीवों प्यारों से !
कविः
विप्लव
बोगनविलैया के फूलों से
सोकर उठता हूँ जब सुबह को मैं
तो ठण्डी बयारों के साथ तुम्हे झूमता देखता हूँ
बोगनविलैया के फूलों
हरे रंग के पेड़ों को तुमने
ढॉंप रखा है अपनी पीली-श्वेत सी
आभा से
कहीं-कहीं पर ठिठोली करते
लाल रंग के तुम्हारे भाईयों को भी
पाता हूँ मैं
पक्षियों का कलरव
उस पर तुम्हारी यह थिरकन
बन जाती है एक अदभुत समा
मेरे लिये
मेरा कोई दोस्त नही है
उस दोस्त को तुम्हारे अंदर
पाता हूँ मैं
तुमसे जी भरकर बातें करना
चाहता हूँ मैं
कविः-
विप्लव,
तो ठण्डी बयारों के साथ तुम्हे झूमता देखता हूँ
बोगनविलैया के फूलों
हरे रंग के पेड़ों को तुमने
ढॉंप रखा है अपनी पीली-श्वेत सी
आभा से
कहीं-कहीं पर ठिठोली करते
लाल रंग के तुम्हारे भाईयों को भी
पाता हूँ मैं
पक्षियों का कलरव
उस पर तुम्हारी यह थिरकन
बन जाती है एक अदभुत समा
मेरे लिये
मेरा कोई दोस्त नही है
उस दोस्त को तुम्हारे अंदर
पाता हूँ मैं
तुमसे जी भरकर बातें करना
चाहता हूँ मैं
कविः-
विप्लव,
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