Saturday, June 26, 2010

सृजन

srujan_hussain सृजन, कुछ शब्दों का बस मेल नहीं
यह तो सारी कल्पनाओं का जीवंत सार है
एफिल, गीज़ा और मोनालिसा तो नमूने भर हैं
सृजन में तो अनंत सा विस्तार है।

बांध तो सृजन को कोई कला से भी सकता है
लेकिन क्या इतने भर से यह कभी थमा है
या फिर हर जड़ में चेतन का संचार
कहीं सृजन से ही तो नहीं बना है!

 

सृजन उस बच्चे सा सरल है
जिसने अभी-अभी शब्द का अंतर पहचाना
या फिर उस ममता सा मधुर भी
जिसने जीवन के अमरत्व को जाना

मेरे तुम्हारे सृजन के मायने
अलग जरूर हो सकते हैं
लेकिन लक्ष्य सबका एक है
खुशी की वास्तविकता को महसूस कर पाना।

 

 

चित्र साभार- मकबूल फिदा हुसैन की प्रसिद्ध कृति 'मदर टेरेसा'

दिल्ली पेरिस बन रही है

delhi-paris

सड़कें खुद रही हैं
फ्लाईओवर बन रहे हैं
मैट्रो उड़ रही है
क्योंकि दिल्ली पेरिस बन रही है

कॉमनवैल्थ आ रहे हैं
अफसर इधर-उधर भाग रहे हैं
शीला भी मुस्कुरा रही हैं
क्योंकि दिल्ली पेरिस बन रही है

मकबरे फिर से जवां हो रहे हैं
दिल्ली-वाले एशियाड के किस्से दोहरा रहे हैं
विश्वविद्यालय-गेस्टहाउस और घर होटल बन रहे हैं
क्योंकि दिल्ली पेरिस बन रही है

झुग्गियों पर बुलडोजर चढ़ाए जा रहे हैं
गांव वाले, वापिस गांव भगाए जा रहे हैं
एथलीट पूरा जोर लगाने की तैयारी में हैं
क्योंकि दिल्ली पेरिस बन रही है

होटलों पर होटल बनते जा रहे हैं
रोज नए-नए प्लान आ रहे हैं
रिसेशन के मारे नौकरी को ललचा रहे हैं
क्योंकि दिल्ली पेरिस बन रही है

मजदूरों के  दस्ते मार्च करते नजर आ रहे हैं
सुपरवाइजर साहब भी गुर्रा रहे हैं,
मजदूर के घर में रोटी पक रही है
क्योंकि दिल्ली पेरिस बन रही है!

Saturday, May 8, 2010

आज कुछ यूं हुआ कि

tum

आज कुछ यूं हुआ कि
बीते समय की परछाईयां यूं ही चली आईं
लगा कुछ ऐसा जैसे 'कल’ जिसे हमने साथ जीया था
बस पल में सिमट भर रह गया हो।

वो जेएनयू का सपाट सा रास्ता
तुम्हारी सुगंध से महकता हुआ,
नहीं-नहीं, वो तो बासी रजनीगंधा की
बेकरार सी एक महक थी!

वो कोने वाली कैंटीन की मेज
जहां तुम बैठा करती थीं,
कुछ झूठे चाय के कप, सांभर की कटोरी
वहां अब भी रखे हुए हैं!

डीटीसी की बस की कोने की सीट
जहां तुम्हारे सुनहरे बाल और आंखे,
धूप में चमका करते थे,
अब वहां बस मैं अकेला बैठता हूं!

वो दिन, जब हम पहली बार मिले थे,
वो कूड़े वाला पासपोर्ट,
वो बस के बोनट पर बैठ मुस्कुराती सी तुम
तुम्हारा साथ, अब सब स्मृति

तस्वीर में तुम्हारा साथ न आना
दूर दूर चलते जाना
वो लंबी बेचैनी ,
वो तन्हा थे दिन

तुम्हारे लिए,
मैने उम्मीद को जिंदा बनाए रखा,
लगता था मुझे तुम आओगी पास
पर अब सब...

अब तुम समय के रथ पर सवार,
जा रही हो, महाद्वीपों से भी पार
मैं जमीन का कवि
जमीन से चस्पां मेरी कविता

यह कविता, नेरुदा की तरह
मेरी आखिरी भेंट है तुम्हे,
मेरा प्यार, तुम्हारे अभाव में,
तुम्हे भूलता जाएगा, शायद!!!

Wednesday, April 28, 2010

वो फिलिस्तिीन का साथ

gaza_delhi

गाज़ा जिन दिनों सह रहा था यातना
इस्त्राइली टैंक जब उसका सीना कुचल रहे थे
बमों के धुंए से घुट रहीं थी जब उसके लोगों की सांसे
भूख से बिलखते बच्चे टैंको पर पत्थर बरसा रहे थे,
तब उस सर्द दिन, गाज़ा से बहुत दूर किसी दूर देश में
दौड़ पड़े सैकड़ों कदम, गाजा तेरे साथ में,
करने इस्त्राइली बर्बरता का विरोध,
देने फिलीस्तिीनी अवाम का साथ,
वो लड़की,
सख्त चेहरा, मजबूत और एक जिंदा दिल लिए
जिसके नारों का गर्जन, युवामय उत्साह और जोश
भीड़ के आक्रोश के साथ मिल,
सजीव बना रहा था, उस दिन की स्मृतियों को
गाज़ा धुंए में सुलग रहा था, और कुछ नौकरशाह,
किसी सुदूर मुल्क के राजदूतावास में चैन की नींद में थे,
विद्रोह से उनकी नींद में कुछ खलल तो पड़ा शायद,
या देशी बबर्रों की फौज पर उन्हे पूरा   भरोसा था 
अराफत का काफिया बांधे वो दडिय़ल सा युवक,
सीना तान खड़ा था, उनकी लाठियों को देते चुनौती
शायद उसे भरोसा था, कि उसकी छोटी सी कोशिश
साथ ले पाएगी किसी दिन लाखों-लाख अवाम को,
और तब शायद छंटेंगे,  गाज़ा पर से धुंए के बादल!

Sunday, February 28, 2010

बसंत का गीत

spring

जब सर्द हवाएं
सांय-सांय बियाबान पार कर जाती हैं
जब रात का स्याह घेर लेता है मुझको
तब याद आती हो तुम

खामोशी और भी गहरी होती जाती
दूरियां भी शायद बढ़ती ही जातीं
और धुंधलता जाता अतीत
तब याद आती हो तुम

जब बसंत की रुत आती है
चारों ओर जीवंतता छाती है
और खिलते हैं रंग-बिरंगे फूल
तब याद आती हो तुम

यह सारा बसंत, यह सारी जीवंतता
यह रंग बिरंगे फूल
सब तुम्हारे लिए हैं
और तुम्हारी याद दिलाते हैं।

Friday, December 11, 2009

दो आंसू टपके तो सही

tears कहीं दो आंसू टपके तो सही
कहीं कोई पेड़ तो बरसों सुलगता रहा
खुद अपनी ही अग्रि में जलता वो रहा
कहीं दो आंसू टपके तो सही

हल्ला कुछ भी रहा हो
चाहे जो भी मसला हो
फिक्र तो नहीं, लेकिन
कहीं दो आंसू टपके तो सही

कहानियों का क्या है,
आती जाती रहती हैं
लोग इंतज़ार में रहते हैं,लेकिन
कहीं दो आंसू टपके तो सही

लोग रहे या न रहें
जरूरी नहीं कि हम भी रहें
हकीकत के बाने पर धागे कुछ भी बुने जाएं, लेकिन
कहीं दो आंसू टपके तो सही!

Tuesday, September 15, 2009

Memories

anamika I am sitting here
in this hollow time,
and beyond the dusky memories
her image is quiet clear to me!

I loved her, or not
that is not sure to me
but like a blind faith
she always loved me

Those were the dusky days
but her innocent love
like a light in the dark
always took care of me!

I am thankful to every breeze
that took me to her,
Whenever I felt myself alone
here too, her memri'es took care of me!

-for 'Anamika'

 
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